यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए होने वाले कुछ लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) दोबारा लागू होने जा रहा है। हालांकि, इस बदलाव का सीधा बोझ आम उपभोक्ताओं पर पड़ने की संभावना फिलहाल सीमित बताई जा रही है। इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, MDR मुख्य रूप से व्यापारियों से लिया जाने वाला शुल्क है, इसलिए ग्राहकों से सीधे अतिरिक्त भुगतान वसूलना अनिवार्य नहीं होगा। हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अलग-अलग व्यापारी इस लागत को किस तरह संभालते हैं।
बड़े कारोबारियों के लिए लागत संभालना संभव –
बड़े रिटेल चेन, रेस्तरां और अन्य संगठित कारोबारी प्रतिस्पर्धी बाजार को देखते हुए MDR की लागत खुद वहन कर सकते हैं। उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि बड़े कारोबारियों के लिए इस शुल्क का असर उनकी कुल कारोबारी गतिविधियों की तुलना में सीमित रह सकता है, हालांकि इससे उनके मुनाफे पर कुछ दबाव जरूर पड़ेगा।
विशेष रूप से ऐसे समय में जब कई कंपनियां कमोडिटी की बढ़ती लागत और अन्य खर्चों के दबाव का सामना कर रही हैं, अतिरिक्त भुगतान लागत उनके मार्जिन को प्रभावित कर सकती है। इसके बावजूद बड़े कारोबारी ग्राहकों पर सीधे यह बोझ डालने के बजाय इसे अपनी लागत में शामिल करने का विकल्प चुन सकते हैं।
छोटे व्यापारियों पर पड़ सकता है ज्यादा असर –
छोटे दुकानदारों और व्यापारियों के लिए स्थिति अलग हो सकती है। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, छोटे कारोबारी MDR की लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों से वसूलने पर विचार कर सकते हैं। इससे कुछ मामलों में UPI भुगतान के बजाय नकद भुगतान को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति भी बढ़ सकती है।
हालांकि, सरकार ने छोटे व्यापारियों की एक श्रेणी को राहत दी है। P2PM श्रेणी में UPI QR के जरिए प्रति माह 1 लाख रुपये तक प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों के लिए शून्य MDR जारी रहने की बात कही गई है। लेकिन महानगरों और बड़े शहरों में कई किराना दुकानों का UPI भुगतान कारोबार इस सीमा से अधिक हो सकता है।
किराना दुकानों में UPI का बड़ा हिस्सा –
ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन के अध्यक्ष धैर्यशील पाटिल के अनुसार, मौजूदा समय में किराना दुकानों पर होने वाले करीब 60 प्रतिशत भुगतान UPI के जरिए किए जाते हैं। ऐसे में MDR व्यवस्था का छोटे व्यापारियों के भुगतान व्यवहार पर प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है।
कुछ व्यापारी शुल्क से बचने के लिए 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान को अलग-अलग लेनदेन में बांटने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। इससे UPI लेनदेन की संख्या बढ़ सकती है, हालांकि इस तरह की व्यवस्था की निगरानी और अनुपालन सुनिश्चित करना एक चुनौती हो सकता है।
2,000 रुपये से अधिक के UPI भुगतान पर MDR –
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के अनुसार, 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के Person-to-Merchant (P2M) UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा। वहीं, Person-to-Person (P2P) UPI भुगतान पर शुल्क नहीं लगाया जाएगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर MDR की अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति लेनदेन रखी गई है।
उपभोक्ताओं के लिए क्या बदलेगा? –
आम ग्राहक के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि MDR सीधे उपभोक्ता से लिया जाने वाला शुल्क नहीं है। इसलिए UPI से भुगतान करते समय हर ग्राहक से अलग से MDR वसूलना इस व्यवस्था का उद्देश्य नहीं है। हालांकि, यदि छोटे व्यापारी बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा अपनी कीमतों में शामिल करते हैं, तो इसका अप्रत्यक्ष असर ग्राहकों तक पहुंच सकता है।
इसलिए आने वाले समय में UPI भुगतान की लागत का वास्तविक प्रभाव व्यापारियों के आकार, भुगतान की मात्रा और उनकी मूल्य निर्धारण रणनीति पर निर्भर करेगा। बड़े कारोबारी लागत को खुद वहन कर सकते हैं, जबकि छोटे कारोबारियों के सामने लागत और भुगतान माध्यम को लेकर अलग विकल्प हो सकते हैं। 5
UPI इकोसिस्टम की वित्तीय स्थिरता पर जोर –
MDR व्यवस्था को UPI भुगतान ढांचे से जुड़े बैंकों, पेमेंट नेटवर्क और अन्य भागीदारों की लागत को समर्थन देने के नजरिए से भी देखा जा रहा है। नई व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि P2P भुगतान मुफ्त बना रहेगा, जबकि निर्धारित सीमा से ऊपर के P2M लेनदेन पर शुल्क लागू होगा।
कुल मिलाकर, MDR की वापसी से UPI इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं पर तत्काल और सीधा बड़ा वित्तीय बोझ पड़ना जरूरी नहीं है। हालांकि, छोटे व्यापारियों के व्यवहार और उनके द्वारा लागत को ग्राहकों तक पहुंचाने की रणनीति आने वाले महीनों में इस बदलाव के वास्तविक प्रभाव को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।